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सलकनपुर विवाद में नई परतें: नकद भुगतान से शुरू हुआ विवाद या व्यवस्था की खामी?

ऑनलाइन भुगतान की सुविधा क्यों नहीं,

सलकनपुर विवाद में नई परतें: नकद भुगतान से शुरू हुआ विवाद या व्यवस्था की खामी?ऑनलाइन भुगतान की सुविधा क्यों नहीं,
रेहटी। सलकनपुर देवी धाम में श्रद्धालुओं के साथ मारपीट और वाहन में तोड़फोड़ की घटना के बाद मामला अब केवल विवाद और पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। घटना को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ मंदिर में श्रद्धालुओं से लिए जाने वाले 20 रूपये के शुल्क, उसकी वसूली की व्यवस्था, पार्किंग सुविधा, नकद भुगतान की अनिवार्यता और मंदिर समिति के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। घटना के बाद कांग्रेस ने सोमवार को सलकनपुर देवी धाम के वाहन मार्ग पर स्थित मंदिर गेट के सामने प्रदर्शन करते हुए जमकर नारेबाजी की और मंदिर ट्रस्ट समिति को भंग करने की मांग उठाई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपते हुए श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने, मंदिर समिति की कार्यप्रणाली की जांच कराने तथा घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। हालांकि मंदिर समिति की ओर से जारी पत्र में घटना को लेकर अलग पक्ष सामने रखा गया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि विवाद में शामिल बताए जा रहे लोग मंदिर समिति या अध्यक्ष से सीधे जुड़े स्थायी कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि वहां दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले मजदूर हैं। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस को सूचना देने और संबंधित मजदूरों को काम से हटाने की बात भी पत्र में कही गई है। लेकिन इसी स्पष्टीकरण ने अब एक और सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि यह लोग मंदिर परिसर की व्यवस्था और श्रद्धालुओं से जुड़े कार्यों में दैनिक वेतन पर लगाए गए थे तो उनकी जवाबदेही आखिर किसकी थी?
20 रूपये की रसीद बनी विवाद की जड़- यदि नगद राशि नहीं तो ऑनलाइन सुविधा क्यों नहीं
विवाद की शुरुआत वाहन से संबंधित 20 रूपये की रसीद को लेकर हुई। जानकारी के अनुसार देवास जिले से आए श्रद्धालुओं से वाहन के प्रवेश के दौरान 20 रूपये की राशि मांगी गई थी। इसी भुगतान को लेकर विवाद हुआ और बाद में श्रद्धालुओं के साथ मारपीट तथा उनकी इनोवा कार में तोड़फोड़ का आरोप सामने आया। यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है कि श्रद्धालुओं से राशि वसूलने की व्यवस्था आखिर कैसी है? यदि किसी श्रद्धालु के पास नगद राशि नहीं है और वह ऑनलाइन भुगतान करना चाहता है, तो क्या उसके लिए मंदिर परिसर में यूपीआई अथवा अन्य डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध है? यदि नहीं है तो आज के डिजिटल दौर में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई? देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और नकद लेनदेन को कम करने की लगातार अपील की जा रही है। ऐसे में धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं को डिजिटल भुगतान का विकल्प उपलब्ध कराया जाना स्वाभाविक व्यवस्था मानी जा सकती है। यदि 20 रूपये का शुल्क लेना अनिवार्य है तो श्रद्धालुओं को नगद के साथ ऑनलाइन भुगतान का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि भुगतान के तरीके को लेकर किसी प्रकार का विवाद पैदा ही न हो।
आखिर किस सुविधा का शुल्क? राशि लेने के बाद दी जा रही कौन सी सुविधा
इस विवाद ने वसूली के उद्देश्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जाता है कि यह राशि वाहनों से सड़क निर्माण अथवा सड़क पर खर्च हुई राशि की भरपाई के नाम पर ली जाती है। दूसरी ओर इसे पार्किंग शुल्क भी बताया जाता है।
यदि यह सड़क निर्माण अथवा मार्ग के रखरखाव का शुल्क है तो उसकी स्पष्ट जानकारी श्रद्धालुओं को दी जानी चाहिए। यदि यह पार्किंग शुल्क है तो फिर श्रद्धालुओं को इसके बदले पार्किंग की समुचित सुविधा मिलनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सलकनपुर में 20 रूपये का शुल्क लेने के बदले श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थित पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है? क्या पार्किंग स्थल निर्धारित है? क्या वहां वाहनों को व्यवस्थित रूप से खड़ा करवाने के लिए कर्मचारी तैनात हैं? क्या पार्किंग की सुरक्षा और निगरानी की कोई व्यवस्था है? जमीनी स्थिति को लेकर सामने आ रही शिकायतें इन सवालों को और गंभीर बना देती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि ऊपर पहुंचने के बाद कई बार निजी दुकानदारों द्वारा अपनी दुकानों के आसपास वाहन खड़े करवाए जाते हैं और खरीदारी के लिए दबाव बनाया जाता है। यदि ऐसा हो रहा है तो मंदिर प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि श्रद्धालुओं से लिया जाने वाला शुल्क आखिर किस सुविधा के लिए है और पार्किंग व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है।
यदि मंदिर प्रशासन पार्किंग शुल्क लेता है, लेकिन व्यवस्थित पार्किंग स्थल, कर्मचारी, सुरक्षा और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराता तो श्रद्धालुओं के बीच असंतोष होना स्वाभाविक है।
दैनिक वेतन कर्मचारियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल
मंदिर समिति द्वारा जारी पत्र में विवाद में शामिल बताए जा रहे लोगों को दैनिक वेतन पर काम करने वाला बताया गया है। समिति ने यह भी कहा है कि घटना का मंदिर समिति अथवा अध्यक्ष से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि यदि यह मजदूर मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए लगाए गए थे और श्रद्धालुओं से संबंधित कार्य कर रहे थे, तो उनकी नियुक्ति किसके माध्यम से हुई? उन्हें किस अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति ने यह कार्य सौंपा था? श्रद्धालुओं से शुल्क वसूलने का अधिकार उन्हें किसने दिया था? उनके काम की निगरानी कौन करता था? और यदि किसी श्रद्धालु से विवाद की स्थिति बनती है तो जवाबदेही किसकी तय होती है? इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मामला अब केवल दो पक्षों के बीच हुए विवाद का नहीं रह गया है बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल सलकनपुर धाम में श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराई जा रही व्यवस्थाओं से जुड़ गया है।
कांग्रेस ने ट्रस्ट अध्यक्ष और समिति पर लगाए आरोप
कांग्रेस इस पूरे मामले में सीधे तौर पर ट्रस्ट अध्यक्ष और मंदिर समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यदि मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं से शुल्क वसूला जा रहा है और वहां तैनात लोग श्रद्धालुओं के साथ विवाद में शामिल होते हैं, तो मंदिर प्रबंधन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। हालांकि घटना की वास्तविक जिम्मेदारी और आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। पुलिस द्वारा प्रकरण दर्ज किया जा चुका है और अब जांच में यह सामने आना महत्वपूर्ण होगा कि विवाद की शुरुआत किस बात से हुई, मारपीट में कौन लोग शामिल थे, वाहन में तोड़फोड़ किसने की और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए तैनात व्यवस्था की उस समय क्या भूमिका थी।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा- लेकिन ट्रस्ट इस मामले में अनजान
सलकनपुर देवी धाम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में किसी भी शुल्क, पार्किंग या अन्य व्यवस्था को लेकर विवाद की स्थिति बनने से पहले स्पष्ट नियम, पारदर्शी शुल्क व्यवस्था, डिजिटल भुगतान की सुविधा, व्यवस्थित पार्किंग और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था होना जरूरी है।
मंदिर समिति को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि श्रद्धालुओं से लिए जाने वाले शुल्क का वास्तविक उद्देश्य क्या है। यदि यह पार्किंग शुल्क है तो पार्किंग कहां है? यदि सड़क निर्माण या रखरखाव का शुल्क है तो इसकी जानकारी रसीद पर स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दी जाती? यदि दोनों अलग-अलग शुल्क हैं तो श्रद्धालुओं को इसकी जानकारी और सुविधाएं किस प्रकार दी जा रही हैं?

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