बुधनी विधानसभा भाजपा में आंतरिक संकट- कांग्रेस के आयातित नेताओं को मिल रही तवज्जो से बन रहे हालात
रेहटी- बुधनी विधानसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी एक गंभीर आंतरिक कलह का सामना कर रही ह जिसका मूल कारण कांग्रेस से आए नेताओं को दी जा रही अत्यधिक तवज्जो है। पार्टी की यह उदारता अब पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए गहरे असंतोष का कारण बन रही हैं। भाजपा के जमीनी भाजपा कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं कि उनकी वर्षों की मेहनत और निष्ठा की उपेक्षा की जा रही है। जबकि दल-बदल कर आए नेताओं को तुरंत संगठन में महत्वपूर्ण पद और मंच पर स्थान मिल रहा है। जिससे उनके सम्मान को ठेस पहुँची है।.यह असंतोष तब और गहरा गया जब कई नए पदाधिकारियों पर दोहरा खेल खेलने और चुनावी समय में कांग्रेस प्रत्याशी के साथ नज़दीकी रखने के आरोप लगे। जिसे कार्यकर्ताओं ने पार्टी की पीठ में छुरा घोंपने जैसा व्यवहार माना। भाजपा की इस अंदरूनी कलह का सीधा असर चुनावी नतीजों पर देखा गया। जहाँ 2023 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने रिकॉर्ड डेढ़ लाख मतों की बढ़त हासिल की थी। वहीं 2024 के उपचुनाव में यह अंतर घटकर मात्र 15,000 मतों पर आ गया। राजनीतिक विश्लेषक इसे स्पष्ट रूप से गुटबाजी, अंदरूनी कलह और उपेक्षित कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता का परिणाम मान रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की माने तो उन्होंने पार्टी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर किया है। लेकिन भाजपा में वह सम्मान नहीं मिल पा रहा जिसकी वह अपेक्षा कर रहे थे। कार्यकर्ताओ के अनुसार उनकी इस धारणा को ठेस पहुँची है कि निष्ठा और कड़ी मेहनत का पार्टी में सम्मान होगा। परंतु जब कांग्रेस से आए नेताओं को तुरंत बड़े पद मिल जाते हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी वर्षों की तपस्या को पार्टी ने उपेक्षित मान लिया है। इसलिए वह खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दूसरी और कार्यकर्ताओं का मानना है कि आज के राजनीतिक परिदृश्य में स्थानीय नेतृत्व का प्रभाव कम हो रहा है क्योंकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में कांग्रेस से आए बाहरी नेताओं को तवज्जो दी जा रही है। उनकी नेतृत्व की क्षमता और स्थानीय पकड़ पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि उनके वर्षों के अनुभव को अनदेखा किया जा रहा है, जिससे उनका राजनीतिक रसूख घट रहा है। बुधनी विधानसभा में अब राजनीति का नया प्रदर्शन देखने को मिल रहा है जिसमें माना जा रहा है कि भाजपा में यह असंतोष केवल पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं बल्कि निष्ठा बनाम अवसरवाद की लड़ाई बन चुका है। जब पार्टी अपने मूल कार्यकर्ताओं के सम्मान की रक्षा करने में विफल रहती है, तो यह ज़मीनी स्तर पर अपनी नींव खोने लगती है। उपचुनाव का नतीजा यह चेतावनी दे रहा है कि यदि यह अंदरूनी कलह जल्द नहीं सुलझी तो आने वाले बड़े चुनावों में भाजपा को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन ऐसा लगता है कि वरिष्ठ नेतृत्व को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा।