भाजपा में नए मेहमानों का जलवा,कार्यकर्ताओं का धैर्य हवा, बुधनी विधानसभा में मंच पर कांग्रेसी और जमीन पर भाजपाई!
कुर्सियाँ बदलीं, किरदार बदल गर पर जमीनी कार्यकर्ता वहीं के वहीं
बुधनी-बुधनी विधानसभा में इन दिनों एक नया राजनीतिक प्रयोग देखने को मिल रहा है,कांग्रेस से आए नेता मंच पर, और भाजपाई मंच के नीचे। जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे कार्यकर्ताओं के मन की बेचैनी को शब्दों से पहले ही बयान कर देती हैं। एक समय था जब बुधनी विधानसभा में केवल मेहनतकश भाजपा कार्यकर्ताओं का वर्चस्व दिखता था। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डेढ़ लाख मतों की लीड दिलाई थी, जिसका बड़ा श्रेय उन्हीं कार्यकर्ताओं को जाता है जो दिन-रात गांव-गांव घूमकर जनता का दिल जीतते रहे ।
लेकिन उपचुनाव में रमाकांत भार्गव की लीड महज 15,000 पर सिमट जाना,यह संकेत दे गया कि कहीं न कहीं पार्टी के अंदर ही अंदर ‘मंच-राजनीति’ ने असर दिखाना शुरू कर दिया है।
दरअसल, कांग्रेस से भाजपा में आए नए नेताओं के लिए पार्टी के दरवाजे तो खुले, पर मंच के दरवाजे और भी ज्यादा खुले। कांग्रेस से पधारे नेता, जो कल तक भाजपा की आलोचना करने में व्यस्त थे, आज मंच के बीचों-बीच शोभा-बिंदु की तरह चमक रहे हैं। वहीं खाँटी भाजपा कार्यकर्ता जो बूथ से लेकर बारात तक हर जिम्मेदारी निभाते थे,अब मंच के नीचे, कुर्सियों पर, या फिर भीड़ में इज़्ज़त बचाते देखे जा रहे हैं। पार्टी के भीतर खुसर-पुसर यही है कि जो बरसों से काम कर रहा है, उसका नंबर पीछे और जो कुछ दिन पहले आये है, वही स्टार। कहा जा रहा है कि पदों की बारिश नए नेताओं पर ऐसी हुई है कि पुराने कार्यकर्ता छाते लेकर घूम रहे हैं, कहीं उनकी मेहनत भीग न जाए।
एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा हम तो सोच रहे थे कि हम आए, आप आए पर यह तो लग रहा है कि हम गए और आप छा गए।
मंच पर कांग्रेसी और जमीन पर भाजपाई
बुधनी विधानसभा में मंच पर बैठने वालों की सूची भी अब दिलचस्प हो गई है। ऊपर बैठे चेहरे में आधे वो हैं, जिन्हें जनता ने कल तक विपक्ष में देखा था। और नीचे बैठे चेहरे वे हैं, जिन्होंने भाजपा की जड़ें सींचीं थीं। कहने को तो भाजपा बड़े दिल वाली पार्टी मानी जाती है, लेकिन बुधनी विधानसभा में इस समय ‘बड़ा दिल’ नए कांग्रेसियों के लिए ही लगता है। जमीनी कार्यकर्ताओं को यह संदेश साफ़ दिखाई दे रहा है कि
कमीज़ बदलने वालों को गुलदस्ता, और पसीना बहाने वालों को धन्यवाद। यही वजह है कि उपचुनाव में जीत का अंतर कम हुआ और कई बूथों पर नाराज़गी खुलकर सामने आई।
भाजपा के भीतर सवाल वही है, क्या यह ‘मंच-प्रेम’ आगे भी लीड कम करेगा या पुराने कार्यकर्ताओं का मन फिर से मनाया जाएगा। बुधनी की राजनीति इस समय एक ही लाइन में समझी जा सकती है कि मंच पर कांग्रेस, मैदान में भाजपा और जनता कह रही है अब आगे क्या।